किताब समिछा एक देश बारह दुनिया-

एक देश बारह दुनियाकोरकू, तिरमली (नंदी बैल वाले), सैय्यद मदारी के बाद अब पारधी पारधी का अर्थ है शिकार करने वाला। किंतु, अंग्रेजों के बनाए एक कानून ने इनके माथे पर ऐसा दाग दिया है जिसके कारण यह आज तक जातीय पूर्वाग्रह, पुलिसिया प्रवृति, प्रणालीगत शोषण और अभावग्रस्त जीवन की कैद में हैं।

मिथकीय इतिहास के चक्के पर अपनी पहचान की तलाश में घूमती यह जनजाति पारंपरिक जमीन के निरंतर छिनते जाने के कारण गुमनामी के अंतिम छोर तक पहुंच चुकी है।इस छोर का एक सिरा वर्ष 1871 के ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम’ से जुड़ा है, जिसमें अंग्रेजों ने सैकड़ों जनजातियों को अपराधी की श्रेणी में रख दिया था।

अंग्रेजों ने ऐसी जनजातियों का दमन करने के लिए पुलिस को विशेष अधिकार दिए थे। पारधी उन्हीं में से एक जनजाति है।दूसरी तरफ, जानकारों का मानना है कि राजा के यहां पारधी शिकार-विशेषज्ञ या सुरक्षा-सलाहकार होता था।

जैसे, राजा कहता कि मुझे शेर पर सवार होना है तो पारधी शेर को पकड़ता और उसे पालतू बनाता। एक तो शेर को जिंदा पकड़ना ही बेहद मुश्किल और फिर उसके बाद उसे पालतू बनाना तो और भी मुश्किल।

बताते हैं कि कई राजा अंग्रेजों के खिलाफ यृद्ध में हार गए तब भी पारधियों ने अंत तक अंग्रेजों से हार नहीं मानीं और वे अंग्रेजों के खिलाफ उग्र प्रतिक्रियाएं देते रहे। इस दौरान उन्होंने कई छापामार लड़ाइयां लड़ीं।

तंग आकर अंग्रेजों ने इन्हें ‘अपराधी’ घोषित कर दिया। भारत आजाद हुआ तो वर्ष 1952 में अंग्रेजों का बनाया वह काला कानून समाप्त हो गया। इसके बाद पारधी को ‘अपराधी’ की जगह ‘विमुक्त’ जनजाति का दर्जा मिला। किंतु, अंग्रेजों के जाने के बाद भी धारणाएं नहीं मिटी।

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लिहाजा, मराठवाड़ा के इन इलाकों में जब भी कोई अपराध होता है तो पुलिस सबसे पहले पारधी जनजाति के लोगों को तलाशने इनकी बस्तियों में छापा मारती है।सच्चाई यह है कि कथाओं से भरे इस विशाल देश में पारधी जनजाति की गौरवगाथा लिखना अभी बाकी है, किंतु सच्चाई यह भी है कि सैकड़ों साल पीड़ा के अंतहीन थपेड़ों को सहन करने वाली पारधी समुदाय आज अपने अस्त्तिव की लड़ाई लड़ रही है।

इसी समुदाय से जुड़ी असल कहानियों को किताब ‘एक देश बारह दुनिया’ के अंदर अलग से एक अध्याय में स्थान दिया गया है।

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पुस्तक के बारे मेंयह पुस्तक एक पत्रकार की है, जो चाहता तो अपने आलेखों को संकलन करके बड़ी आसानी से उन्हें किताब की शक्ल में पिरो सकता था, लेकिन यहां दूरदराज के भारत की असल कहानियों को उजागर करने के लिए नया फार्मेट तैयार किया गया है और नये सिरे से ऐसे रिपोर्ताज लिखे गए हैं.

जिनकी भाषा साहित्यिक यानी संवदेनात्मक है, लेकिन घटनाओं के विवरण और तथ्य पत्रकारिता से प्रेरित।पुस्तक की ज्यादातर कहानियां हाइवे से कई किलोमीटर अंदर की हैं, जहां अमूमन विकास के ढांचे और बैनर नहीं दिखते, बल्कि सड़कें दिखती हैं जो विकास के शहरी नजरिए के साथ जंगलों के दोहन की प्रतीक नजर आती हैं।

यह पुस्तक पत्रकार और पत्रकारिता की सीमा से आगे जाती दिखती है, जहां सूचना, साक्षात्कार और आंकड़ों से परे एक पत्रकार रिपोर्ट से बाहर निकलते हुए अपने अनुभव साझा करता है और जो बतौर ग्रामीण मध्यम वर्गीय मानसिकताओं को लिए खुद अपनी प्रतिक्रियाएं भी व्यक्त करता है।

नए क्लेवर में रिपोर्ताजरिपोर्ताज सामान्यत: हिंदी साहित्य से गायब होते जा रहे हैं, बावजूद इसके अच्छे रिपोर्ताज को लेकर एक अरसे से पाठकों की मांग बनी हुई है।

यहां यह कोशिश की गई है कि देश के विभिन्न भूभागों के हाशिए पर धकेल दिए गए वंचित और पीड़ित समुदायों की अनसुनी कहानियां बाकी दुनिया को सुनाई जाएं। इस अपेक्षा से कि जब किताब के पन्ने दर पन्ने से पाठक गुजरेगा तो हर कहानी का हर पात्र बोल उठे।

एक तरह से हाशिए पर धकेल दिए गए लोगों की आवाज भी है यह रिपोर्ताज-संकलन, जो 2008 से बदलते देश का जरूरी दस्तावेज की तरह तैयार किया गया है।अपने देश को समझने की यात्रामहाराष्ट के विदर्भ और मराठवाड़ा, बस्तर और छत्तीसगढ़ के दूसरे हिस्सों से लेकर बाड़मेर राजस्थान के इलाकों में ग्रामीण पत्रकार द्वारा की यात्राएं वहां के जनजीवन, संस्कृति के साथ-साथ कठोर यथार्थ, विसंगतियों, मौजूदा और भावी संकटों के साथ-साथ त्रासदियों की बानगी बयां करती हैं।

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‘वे तुम्हारी नदी को मैदान बना जाएंगे’ शीर्षक से लिखी एक कहानी का सच यहां और भी वीभत्स और विकराल रुप में सामने आया है। विकास के नाम पर आदिवासी समाज की साफ-सुथरी, निर्मल जीवनदायी नर्मदा नदी को खत्म किया जा रहा है। जिस नर्मदा जल को पिए बिना तृप्ति नहीं होती थी अब उसमें नहाना भी नहीं सुहाता।

आचमन तक में प्रयास कम से कम पानी के इस्तेमाल का होता दिखाई देता है।यात्राओं से उपजी सच्ची कहानियांयात्रा-अनुभवों की इस किताब में ‘न्यू इंडिया’, ‘स्मार्ट सिटी’ के दौर में ‘भारत माता ग्राम वासिनी’ की यात्रा है।

इस किताब के स्थलों, पात्रों से परिचित होना अभाव भरे भारत के उस रूप से परिचित होना है जो न जाने कब से उपेक्षित है, वंचित, अपने पहचान के लिए, अपने अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

चाहे वे महाराष्ट्र के मेलघाट के कुपोषित, संघर्षरत आदिवासी हों या मुंबई के कमाठीपुरा की सेक्स वर्कर्स के जीवन की कथाएं।कमाठीपुरा और नागपाड़ा के जीवन की बहुत अंतरंग झांकियां हैं इस किताब में, उस रहस्यमय रूमान से अलग जो ऐसे इलाकों को लेकर हमारी कल्पनाओं में रहा है या जितना हमने सेक्स वर्करों के किस्से कहानियों से जाना है।

किताब में मराठवाड़ा की घुमंतू जनजातियों के जीवन के दृश्य हैं, नट समुदाय, मदारी समुदाय के जीवन को लेखक ने करीब से देखा और उनके बारे में मार्मिक ढंग से लिखा है। जो बंजारे अपनी कला से कभी लोगों का मनोरंजन करते थे, आज उनको देश के आम नागरिक के अधिकार भी नहीं हैं।

महाराष्ट्र का मराठवाड़ा गन्ना उत्पादन के लिए जाना जाता है, लेकिन वहां के गन्ना मज़दूरों की सुध कौन लेता है? आज भी उनके साथ गुलामों जैसा बर्ताव किया जाता है।

क्या हमारा सिस्टम मजदूर को नागरिक बनने से रोकता है।वहीं, किताब में बस्तर के जीवन और राजनीति के द्वंद्व से जुड़ी कथाएं हैं, अमरकण्टक का बदलता पर्यावरण है।यह एक पत्रकार के अंदर के साहित्यकार की किताब है जिसकी दर्जन भर कथाएं किसी लंबे शोक-गीत की तरह हैं- उदास और गुमनाम। यह किताब यात्रा की तो है, लेकिन ऐसी यात्राओं की किताब है, जिन पर हम अक्सर निकलना नहीं चाहते, ऐसी लोगों की किताब जिनको हम देखते तो हैं पहचान नहीं पाते, जिनके बारे में जानते तो हैं मिलना नहीं चाहते!

शिशिर खरे( Shirish khare ) shirish2410@gmail.com

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